ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव

ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव

ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव आया है। आईए एक नज़र सन 2000 ई० से पहले की स्थिति पर डालें। मेरा जन्म 1978 ई० में बिहार के ज़िला-सीतामढ़ी, प्रखंड-परिहार,  ग्राम-परसा में हुआ था।मेरा जन्म ग़रीब लेकिन शिक्षित परिवार में हुआ था। मैं अपने बारे में बता रहा हूँ ताकि आपको सन 2000 ई० से पहले की शिक्षा की स्थिति समझने में  ज़्यादा आसानी हो। 5 वर्ष की आयु से मैं ने अपनी शिक्षा की यात्रा आरम्भ किया।

गाँव के प्राथमिक विद्यालय में 5 वीं कक्षा तक पढ़ाई की। साथ ही एक शिक्षक ट्यूशन पढ़ाते थे। सुबह-शाम दोनों ट्यूशन पढ़ता था। उस समय गाँव में बहुत ग़रीबी थी। मैं तो टुइशन पढ़ लेता था लेकिन ग़रीब और अशिक्षित परिवार के बच्चे स्कूल भी नहीं जा पाते थे।आईए इसके बारे में विस्तार से चर्चा करें।  यहाँ पढ़ें शिक्षा में खेल का महत्व। देहाती क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव

मेरी शिक्षा के अंदर कमी 

5वीं कक्षा तक ठीक ठाक पढ़ाई हुई लेकिन उसके बाद पढ़ाई कुछ खास नहीं हो पायी। उसके कई कारण थे सब के विषय में विस्तार से चर्चा करेंगे। हलांकि मैं पढ़ने में बहुत तेज़ था कक्षा में हमेशः प्रथम ही आता था। लेकिन अब महसूस होता है कि मेरी शिक्षा में बहुत कमी रह गई।

माता-पिता का ठीक से ध्यान न देना 

मेरे माता-पिता ने कभी ये चेक नहीं किया कि मैं ने क्या पढ़ा, क्या काम मिला स्कूल में या ट्यूशन पर। कुछ याद करना है या लिखना है। मेरे कहने का अर्थ ये नहीं कि उन्हों ने ध्यान नहीं दिया। 5वीं  कक्षा के बाद मैं केवल सुबह को ट्यूशन पढ़ता था। शाम के समय घर पे ही पढ़ता था। शाम के समय माता-पिता सख्ती से पढ़ने को कहते थे। अगर पढ़ने न बैठे तो मार भी पड़ती थी लेकिन कभी देखते नहीं थे कि मैं कर क्या रहा हूँ।किताब खोल कर बैठा हूँ या पढ़ भी रहा हूँ हालाँकि मैं पढ़ाई करता था।  अगर देखते तो ज़्यादा अच्छे से पढ़ाई कर पाता।

स्कूल का दूर होना 

सुबह दो घंटे ट्यूशन करने के बाद 4 कि० मी० पैदल जाना। मध्य विद्यालय मेरे गाँव से 4 कि० मी० की दूरी पर था। रोज़ पैदल ही जाता था और शाम 4 बजे पैदल ही आता था 10 वर्ष की आयु में इतनी दूर पैदल जाना और आना आप समझ सकते हैं कितनी थकवट हो जाती होगी। इस कारण भी शाम के समय ठीक ढंग से पढ़ाई नहीं हो पति थी। 7वीं कक्षा के बाद तो सुबह 2 कि० मी० पैदल ट्यूशन जा कर आना फिर 4 कि० मी० पैदल स्कूल जाना पड़ता था।

18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को काम करने के लिए शहर भेजना

जैसा की ऊपर मैंने बताया कि उस समय गाँव में बहुत ग़रीबी थी। लोग अपने बच्चों को शहरों में कमाने के लिए भेजना शुरू किए। ख़ास कर मुस्लिम समाज के लोग अपने बच्चों को ज़री (कढ़ाई) का काम करने और पैसे कमाने के लिए शहरों में भेजना शुरू कर दिया। 4 से 5 बच्चे मेरे साथ पढ़ने के लिए बच गए। ज़्यादा तर बच्चे 8वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ कर कमाने चले गए।

जब वे कमा कर वापस आये उनका पहनावा स्टाईल और पैसे देख कर जो पढ़ने वाले बच्चे थे उन्हों ने भी पढाई छोड़ दिया। ये बात भी मेरी शिक्षा को प्रभावित किया लेकिन मेरे माता-पिता ने मेरी शिक्षा को बन्द नहीं किया। यह बहुत बड़ी बात थी। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव  नहीं आया था।देहाती क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव

मेरी वजह से मेरी शिक्षा में कमी 

मेरे भी दिमाग़ में पैसे कमाने का भूत सवार हो गया। मैट्रिक के बाद मैं भी शहर को पलायन कर गया हालाँकि मेरे माता-पिता ने आगे पढ़ाने की बहुत कोशिश की। जब मैं शहर आया और लोगों का रहन सहन देखा जो गाँव से कमाने आये थे तो मेरी आँख खुली। लोग जानवर की तरह रहते थे। फिर मैं लौट गया और अपनी पढाई शुरू की। और सन 2000 ई० में अपने ही गाँव में एक निजी स्कूल खोला।

इस से यह बात सामने आई कि सन 2000 ई० से पहले देहाती क्षेत्रों में लोग शिक्षा को महत्व नहीं देते थे। और जो लोग जागरूक थे वो पूरी तरह से ध्यान नहीं देते थे। बस अपने बच्चों को स्कूल, ट्यूशन के भरोसे छोड़ देते थे। मुस्लिम समाज की अपेक्षा हिन्दू समाज के लोग अपने बच्चों की शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान देते थे। मेरे गाँव के आस-पास जितने भी वैसे गाँव जहाँ हिन्दू की संख्या ज़्यादा थी वहाँ के बहुत सारे बच्चे मेरे साथ पढ़ते थे।

मेरी कक्षा में मात्र 4 मुस्लिम बच्चे थे जबकि कुल विद्यार्थियों की संख्या 60 से भी अधिक थी। मध्य एवं उच्च विद्यालय दोनों आस पास ही हैं उस समय दोनों विद्यालयों के विद्यार्थियों की कुल सांख्या 300 से कम थी। जबकि आस पास के 20 से अधिक गाँवों से बच्चे वहां पढ़ने आते थे।

सन 2000 ई० के बाद देहाती क्षेत्रों की शिक्षा में क्रन्तिकारी बदलाव 

सन 2000 ई० के बादशिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव आया। इस क्रांतिकारी बदलाव में सरकारी एवं ग़ैर सरकारी दोनों संस्थाओं ने सराहनिए भूमिका अदा की। आईए इसके बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं।

सरकार  द्वारा चलाई गई योजनाओं का लाभ

सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं में सर्व शिक्षा अभ्यान ने सन 2000 ई० के बाद देहाती क्षेत्रों की शिक्षा में काफी बदलाव लाया। शिक्षा के क्षेत्र में इस अभियान ने हाहाकार मचा दिया। सरकार ने पोशाक राशि, मध्यान भोजन, साईकिल वितरण एवं छात्रवृति जैसी योजना प्रदान की। इन योजनाओं ने लोगों का ध्यान आकर्षित कर शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक किया।

सन 2000 ई० से पहले सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की बहुत कमी थी, सरकार ने नये शिक्षकों की बहाली की। शिक्षकों को प्रशिक्षित किया, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने योग्य शिक्षकों में कौशल का विकास किया। सरकार के इस अभियान ने शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव लाया। आँगन वाड़ी और तालीमी मरकज़ जैसे अभियान ने भी शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने में अहम् भूमिका अदा किया।

हर एक गाँव में मध्य विद्यालय स्थापित करना 

सन 2000 ई० से पहले मध्य और उच्च विद्यालय बहुत दूर-दूर हुआ करता था। लेकिन सरकार ने इस ओर ध्यान दिया और जितने भी प्राथमिक विद्यालय थे सब को मध्य विद्यालय बना दिया। अब प्राथमिक एवं मध्य विद्यालय दोनों साथ-साथ हर एक गाँव में है। उच्च विद्यालय की संख्या भी बढ़ा दी गई है। जितने भी उच्च विद्यालय थे सब को बढ़ा कर बारहवीं तक कर दिया गया है।

निजी विद्यालयों का खुलना

सन 2000 ई० से पहले मेरे गाँव से 5 किमी की दूरी पर मात्र एक निजी विद्यालय हुआ करता था। लेकिन अब लगभग हर एक गाँव में एक निजी विद्यालय है। निजी विद्यालय के खुलने से गाँव के लोगों में शिक्षा के प्रति बहुत ज़्यादा जागरूकता आई है। माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर बहुत ज़्यादा ध्यान देने लगे हैं। वैसे माता-पिता जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते अपने बच्चों को पढ़े-लिखे लोगों से चेक करवाते रहते हैं। खुद बच्चों से पूछते रहते हैं कि स्कूल में क्या काम मिला काम पूरा किया के नहीं, कुछ याद करना तो नहीं है आदि। इन सब बातों की मेरे पढाई के समय में बहुत कमी थी।

मैं इन सब बातों को भली भांति समझता था इस लिए इस क्षेत्र में हम लोगों ने बहुत मेहनत किया। मुराद मेमोरियल पब्लिक स्कूल के सभी शिक्षक गण मिल कर हर एक सप्ताह किसी न किसी गाँव जाकर लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करते थे। लोगों को बताते थे कि केवल अपने बच्चों को स्कूल या ट्यूशन भेज देने से आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती। घर पे अपने बच्चों पे ध्यान देना आपकी ज़िम्मेदारी है।

लोगों ने हमारी बातों को समझना और स्वीकारना शुरू कर दिया।सरकार के आदेशानुसार  प्रत्येक निजी विद्यालयों ने RTI के तहत प्रथम वर्ग के कुल नामांकन का 25 % ग़रीब बच्चों के लिए सुनिश्चित किया। और ग़रीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना आरम्भ कर दिया।  इस प्रकार निजी विद्यालयों की वजह से भी सन 2000 ई० के बाद ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव आया।

बाल मज़दूरी पर अंकुश 

सन 2000 ई० से पहले बाल मज़दूरी आम बात थी। उस समय देहाती क्षेत्रों में बहुत ज़्यादा ग़रीबी थी। कमाई का कोई रास्ता नहीं था। होना तो यूँ चाहिए था के लोग खुद शहरों में जा कर पैसे कमाते और अपने बच्चों को पढ़ाते। लेकिन उस समय लोग शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं थे। शिक्षा के प्रति जागरूक न होने के कारण लोग खुद न जाकर अपने छोटे-छोटे बच्चों (10 से 15 वर्ष ) को शहरों में पैसे कमाने भेजने लगे।

लेकिन सन 2000 ई० के बाद सरकार और निजी संस्थाओं जैसे चाईल्ड लाईन आदि ने इस ओर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया। लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना शुरू किय जिसका लोगों पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। सरकार ने शहरों में जहाँ जहाँ बाल मज़दूरी हो रही थी छापा मार कर बच्चों को बाल मज़दूरी से आज़ाद करवाया और दोषियों को सज़ा मिली। बच्चों को आज़ाद करवा कर उनके घर का पता कर घर तक पहुंचाया।

वैसे बच्चे जिनके माता-पिता न थे या जो अपने बच्चों को पढ़ाने में सक्षम न थे उनको चाईल्ड लाईन के हवाले कर उनकी शिक्षा का प्रबंध किया। इस प्रकार बाल मज़दूरी पर बहुत हद तक अंकुश लग गया और सन 2000 ई० के बाद ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा में क्रान्तिकारी बदलाव आया।

 

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