speech on girls education

शिक्षा (Education)

शिक्षा का अर्थ है सीखना और सिखाने की क्रिया। इस से हम अपनी ज़िन्दगी को बेहतरीन ढंग से जीने का हुनर सीखते हैं। शिक्षा मानव के व्यक्तित्व का विकास कर उच्चतम चरित्र का निर्माण करता है। शिक्षा एक ऐसा सूरज है जिसकी रौशनी इंसान नुमा चाँद पर पड़ कर दुनियाँ को चमकाती है। यहाँ पढ़ें शिक्षा का महत्व

यह मनुष्य में आत्मबोध की क्षमता का विकास करती है। शिक्षित मनुष्य को अपने शक्ति की पहचान होती है, तथा उसको परिवार, समाज, देश, और दुनियाँ के प्रति अपने दाईत्व का ज्ञान होता है। इसके बिना मनुष्य के सर्वांगीण विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। मनुष्य के सर्वांगीण  विकास के लिए यह आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है।

शिक्षा

शिक्षा एक प्रेरणा दायक अनुभव 

हमें हर हाल में शिक्षा प्राप्त करना चाहिए। इसे प्राप्त करने के लिए चाहे जितनी भी मुसीबतें उठानी पड़े हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। यहाँ मैं एक ऐसे ही इंसान की चर्चा करना चाहूँगा जिसने ने बड़ी मुसीबतें उठा कर शिक्षा ग्रहण किया। इस से हम लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए।

यहाँ एक बात और बताता चलूँ। माता-पिता हमें अवसर प्रदान कर सकते हैं। गुरु हमें रास्ता दिखा सकते हैं। लेकिन उस अवसर का फ़ायदा हम को खुद उठाना होगा। गुरु के दिखाए रास्ते पर हमें खुद ही चलना होगा। तब जाकर हम शिक्षा प्राप्त कर पाएँगे।

मेरे गाँव के बग़ल में एक छोटी सी बस्ती है। जिसका नाम बहुअरवा है। उस बस्ती का एक लड़का अनिल कुमार एक दिन मेरे पास आया। कहने लगा सर मुझे आप से ट्यूशन पढ़ना है। मैंने कहा ठीक है कल से आजाना और फ़ीस भी साथ ले आना। उसने कहा ठीक है सर कल से आऊँगा। और फ़ीस भी ले कर आऊँगा।

अगले दिन वो ट्यूशन पढ़ने आगया। जाते वक़्त मैं ने फ़ीस का पूछा उसने कहा सर अभी नहीं है बाद में दे दूँगा। मैंने कहा ठीक है। दो महीने तक मैं ने उसको पढ़ाया उसके बाद उसकी परिक्षा शुरू हो गई। दो महीने पढ़ने के बाद भी उसने फीस नहीं दिया। एक-दो बार मैं ने फ़ीस का पूछा तो बोला देदूँगा। मैं समझ गया इसको प्रॉब्लम है फिर मैं ने उसको फ़ीस के लिए कभी नहीं बोला।

कुछ दिनों बाद उसने मुझे कहा सर मुझे अपने स्कूल में पढ़ाने के लिए रख लीजिए। मैं ने पूछा तुम पढ़ने के लिए बहार नहीं गए। तो उसने कहा सर डिस्टेंस मोड से अड्मिशन लिया है और घर पर ही पढ़ रहा हूँ। मैं ने उसको अपने स्कूल में पढ़ाने के लिए रख लिया। स्कूल में पढ़ाते हुए वह अपनी पढ़ाई भी करता रहा।

उसने ग्रेजुएट डिस्टेंस मोड से ही पूरा किया। ग्रेजुएशन के बाद बीएड के लिए उसको बाहर जाना पड़ा। बीएड पूरा करने के बाद एक दिन मेरे पास आया पैर छू कर प्रणाम किया। मैं ने उसे कुर्सी पर बैठने बोला उसने बहुत ही अच्छे लहजे में जवाब दिया सर मैं अपने गुरु के बराबर बैठने की सोच भी नहीं सकता। मैंने उससे पूछा कैसा रहा तुम्हारा बीएड का सफ़र। उसने जो बताया मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

उसने बताया वह सीतामढ़ी में रहता था। और क्लास करने दरभंगा जाया करता था। सीतामढ़ी से दरभंगा की दूरी लगभग 118 किमी है। वह रोज़ सुबह हल्का नाश्ता करके सीतामढ़ी से दरभंगा के लिए निकलता दिन भर वहाँ क्लास करता और शाम को फिर वापस लौट आता। कमाल की बात यह थी कि उसके पास पैसे नहीं होते थे के वह वहाँ  कुछ खरीद कर खा सके। वहाँ से आने के बाद रात का खाना खाता था।

ग़रीबी के कारण वह चौबीस घंटे में एक बार ही खता था। उसके पास पहनने के लिए बस दो जोड़े कपड़े थे। एक पहन कर जाता दूसरा धो कर सूखने के लिए रख देता और फिर दूसरे दिन उसको पहनता और दूसरा धो कर सूखने के लिए रख देता। इतनी परेशानी के बाद भी उसने पढ़ाई नहीं छोड़ा। और लगातार दो सालों तक उसने ऐसे ही पढ़ाई किया।

इस मेहनत और सब्र का उसको फल भी मिला आज सरकारी कॉलेज में प्रोफ़ेसर है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमें चाहे जितनी बी परेशानी उठानी पड़े हर हाल में शिक्षा प्राप्त करना चाहिए।

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